जुबान ही सिर्फ जरिया नही
जो आप शब्दो को समझ पाएगे
कभी ऑंखो में झांक कर देखिए
हजारो लब्ज खुद ब खुद बिखर जाएगे
दिल को आदत सी हो गई है चोट खाने की
भीगी पल्कों के संग मुस्कराने की
काश अंजाम हम पहले से ही जान जाते
तो कोशिश ही नही करते दिल लगाने की
खामोश रात के पेहलू में सितारे नही होते
इन रूखी ऑंखो में रंगीन नजारे नही होते
हम भी न करते परवाह आपकी
अगर आप इतने प्यारे न होते
खुद को खुद की नजर न लगे
कोई अच्छा भी इस कदर न लगे
आप को देखा है बस उस नजर से
जिस नजर से आपको नजर न लगे
जब खामोंश ऑंखो से बात होती है
ऐसे ही मोहब्बत की शुरूआत होती है
तुम्हारे ख्यालों में इतने डूबे रहते है हम
पता नही कब दिन कब, कब रात होती है
दिल गुमसुम जुबान खामोश क्यो है
ये ऑंखे आज यों नम क्यों है
जब कभी पाया ही नही था उन्हे
तो आज खोने का गम क्यों है
चंद लम्हों की जिन्दगी है
यू नफरतों से जिया नही करते
क्यों लगता है कि अब दुश्मनों से गुजारिश करू
क्योंकि दोस्त तो अब याद ही नही किया करते